सरहद पार ..
रोज सुबह हुई..
शाम हुई...
सूरज उगा ..
ढला भी..
धरती मेरे गांव की..
ऐसी भई...
जहाँ हर पल ...
घनी रात भई....
उस रूठे २ सूरज को..
इस धरती पर..
अब मैं.
मना कर लाऊँ कैसे ?.....
रोज सुबह हुई..
शाम हुई...
सूरज उगा ..
ढला भी..
धरती मेरे गांव की..
ऐसी भई...
जहाँ हर पल ...
घनी रात भई....
उस रूठे २ सूरज को..
इस धरती पर..
अब मैं.
मना कर लाऊँ कैसे ?.....
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