जब से हर रसोई में महंगाई आई है...
भाई भाई के प्यार में स्वार्थ की रेखा ..
खिंची सी पायी है...
अब भोजन कम, हर रिश्ता ज्यादा भुनाया जाता है...
हर वक़्त के भोजन में, इक रिश्ता पकाया जाता है...
हर बहिन अब रोती है, राखी भी रिश्तों का वज़न ढोती है..
अब भाई भी राखी से कतराता है, हर बरस जब रक्षा बंधन ..
पर्व समय से आता है...
अब तो महंगाई का तकाजा इतना है...
लाश सस्ती, कफ़न महंगा ..
हर इक शख्स के कंधे जनाज़ा खुद उसका है....रामेश्वरी
वाह बहुत सुंदर
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