कीमतों में आ रहा उछाल..
भूखे पेटों, में राशन का सवाल ..
एक बेटी के गरीब बाप पर दहेज़ का बवाल ..
पिस रहे चक्की एक, छूटा धर्म जाति का सवाल ..
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
इसमें दोष किसका है ?
कोई नहीं किसी के साथ ..
पनप रहा हर ह्रदय एक अवसाद..
छोटी सी बात पर उठ रहे हाथ ..
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
इंसान और जानवर में फर्क कहाँ है?
इस फसाद की जड़ कहाँ है...
ये बोया गया बीज किसका है?
मुस्किल में हर जान..
थकी२ सी रूहें हैं, भटक रहे सभी परेशान..
जुगाड़ करें कैसे अब, रखें कैसे झूठी शान ..
किस्तों में जी रहे, बस किश्तें ही चुका रहे...
इन किश्तों का असल मुंशी कौन ?
अपने ही असल पर ब्याज हम चुका रहे...
जनता का फिर से एक ही सवाल ?
किस जन्म कर्ज ये, ये उधार किसका है?...........रामेश्वरी

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