जो अहंकार चेहरे और तन मन पर ओड़े बैठे थे..
क्या मालूम है उन्हें, होगा ऐसा भी...
मौसम रूख बदलेगा, आएँगी गर्मियां कभी..
वो ये सोच कर, लम्बे सफ़र पर निकले थे ..
हाथ होगा उनका, उनके हाथ,
साया तो साथ देता नहीं, होता ऐसा भी..
सूखे थे नैन सुख से जिनके...
वहां बरसेगा सावन बेमौसम का ..
होगा दरिया दोनों के दरमियाँ कभी...
वो कूद तो पड़े दरिया में..
सोच पार होगी दुनिया की तंग गली...
क्या मालूम था, पी जाएगा इक घूंट में..
सागर वो दरिया भी कभी................
वो खुश थे झूठ पर अपने सभी..
बहार है सदा के लिए, अबके आई जो कभी..
यौवन का नशा चढ़ा है उन पर भी...
अहंकार औलाद पर उनको सभी..
द्वार खुले आंगन के सभी, पतझड़ आएगा ना कभी..
आज दूर है वो अपनों से सभी..
हवा दे रहा वो, सुखो को सभी...
ज्यादा हवा ना दो, उड़ जायेंगे सभी..
गम की रेत भी, संग हवा आ जाये कभी...
अपनों की याद गर आने लगे ..
नब्ज उदास से लगी, ठंडी सी लगे..
समझो फिर से सर्दियां आ गयीं.....................रामेश्वरी

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