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Sunday, October 16, 2011


कल देखा छलनी से मुझे बड़े प्यार से...
आज छलनी हूँ में उसकी तकरार से...

कल ले बलायियाँ मुझे पे वो  वार रही थी..
आज समझ बला मुझपर कर वार रही थी...

कल माथे पे मेरे प्यार का टिका था ...
आज ना पूछो कैसे इक पैर पर मेरा शरीर टिका है..

कल रख उपवास विचलित से उसके दिन रैन थे ...
आज जैसे खा जायेगी मुझे ही ऐसे उसके नैन थे..

इक दिन चरण छुए उसने कर्ज ये चुकाऊँगा...
३६४ दिन अब उसके चरण में दबाऊँगा....
सावित्री वो बन गयी ...
अब सत्य वान में ही कहलाऊँगा...(रामेश्वरी)

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