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Tuesday, October 11, 2011

दिन-दिन, पल-पल, रैन रैन गिन हम जीते हैं...
जीने को आह़त छिद्रित ह्रदय को हर कोने से यूँ सीते हैं..

इन बूढी आँखों में बेशुमार बहता प्यार देखा है.....
विरह में डूबा इन आँखों का इंतज़ार देखा है....

कब आओगे बेटे घर...?
टक टकी लगाये खड़ी इक पांव पर ..
माँ का निराश चेहरा देखा है........

बाल सफ़ेद हमने किये..
सफ़ेद खून क्यूँ हमारा हुआ...
कभी वनवास माँ ने दिया था...
आज माँ को वनवास क्यूँ हुआ...
ये जन्म देने की सजा है शायद ..
जो आज मुझे आजीवन कारावास हुआ..

(रामेश्वरी

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