मन का हिलोर
आम शब्दों में, आम इंसान की, कुछ आम सी भावनाएं ।
Search My Blog
Wednesday, February 29, 2012
दल बद्लूओं का रूप भी अजब देखिये..
बैठे संग जहाँ सेठ के, तन कितना अकड़ा है..
जहाँ बैठे भूखे संग, अंतड़ियां सूखी, ऑंखें ऐसी...
जैसे बरसों से ताका नहीं, रोटी का मुखड़ा है ...रामेश्वरी
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment