बचपन खिलेगा आँगन मेरे फिर..
लकड़ी की कांठी होगी फिर आँगन में..
होगी फिर से लोरियौं की गूंज....
सजन तुम पिता मैं माता बन जाऊंगी ..
लगाऊंगी कारा टीका माथे उसके ..
नज़र बुरी बाला का, लल्ला से हटाऊंगी .....
अँखियाँ ना होंगी सुनी उसकी, रोज ..
अंखियों में कजरा मैं सजाऊँगी...
कान्हा नाराज़ ना होना, पूजा आज तक तुम्हें ..
कुछ दिन इसी में, रूप तुम्हारा पाऊंगी, सजाऊँगी ..
अब मैं भी देवकी, यशोदा माँ बन जाऊंगी........................ .रामेश्वरी

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