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Wednesday, February 29, 2012

लौट चल, आँगन अपने ..


चल नादाँ अभी वक़्त है लौट चल, आँगन अपने ..
उस माँ की गोद में, जो दे रही पुकार कब से तुझे..
जिसके अंग अंग में, मातृत्व स्नेह झरना कलकल बहे..
सुना उसका आंगन बिन तेरे, मृत्तिका उससे अब झडे..
पत्थर सीने में उसके पड़े, घायल उसका ह्रदय फ़ूट२ रोये ..
क्यों मेरी संतान, चंद सिक्कों का लोभ, मुझ से दूर होए..
वो बिन तेरे गुमसुम सी है, नदिया(गंगा) नैनो से बहे ..
बिन कलकल किये, दरिया पर भी संतानों ने बाँध पिरोये...
अब यह माँ किस आंगन जाये, किस किस के आगे रोये..
दूध(सुख रहे नदी नाले) अब सीने से उसके उतरता नहीं..
सोच में पड़ी वो, क्यूँ दूध उसका अब दूध नहीं पानी सा होए ..
संतान उसकी दूर उससे, गैर अब सीने से लग उसके हैं सोये ....



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