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Monday, February 20, 2012

दाम में आग

कीमते आसमान छु रहीं, 
तारे गिर पड़े धरातल पर ...
चाँद भी अब मुस्कुराता नहीं, 
किसी चेहरे पे अक्ष उसका ..
नज़र अब आता नहीं.....

भगवन भी अब महेंगे हुए . 
सस्ते में भक्त भी दर्शन पाता नहीं ...
अब तो छाया भी महंगी हुई..
मॉल खड़े बड़े बड़े...
बिना टिप सन्तरी छाया छूने ..
अब देता नहीं....
अब तो प्यार भी महंगा हुआ...
जिसकी जेब गरम, उसी से हुआ ....
गरीब का मोल, अब सस्ता है बस..
जिसने पी वही गया, कुत्ते की तरह ..
उसे कुचलता हुआ ....
अब कैसे हम, अस्तित्व खुद का बचायेंगे...
हर शय के दाम में आग लगी है, कैसे इसे बुझाएंगे

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