पीले हुए पात सभी ह्रदय के मेरे, लगे ज्यूँ पतझड़ आ गया ///
तुम बहते रहे उफनते दरिया की तरह ///
सावन बन बरसो, तुम प्रिये, कर दो हरा, ये उपवन तुम मेरा ///
कोपले उम्मीद की फिर फूटेंगी, कलियाँ नयी जीवन में आएँगी ///
खिलेंगे उपवन पुष्प नए, हँसेगी फिर डाली2, झड़ी वो कब आयेगी ///....(रामेश्वरी... स्पर्धा )
मैं साथ साथ सटी चलती रही किनारों जैसे //
ह्रदय मेरा आकाश तुल्य, करी ना अभी सौतिया डाह ///
जबकि तुम बह कर आज भी, जा रहे सागर की राह// रामेश्वरी
उठाया था मैंने भी, कांधे पर्वत अभावों का ...
जब जब गरीबी आंगन मेरे घुमा करती थी.......
माँ हो परेशां अभावों से, झुन्झुलाया करती.....
मारती वो फिर, ह्रदय भेदी बाण, अचूक थी ....
घायल जब जब हुआ, हृदय तीखे बाणों से....
लगी मुझे सदैव, घावों पे संजीवनी बूटी तुम...रामेश्वरी
तुम दरिया बहता बनों..
मैं मत्स्य बन विचरूंगी..
मैं बनू गर पुष्प बसंत का..
तुम भवंरा बन इतराना ....
तुम हरा भरा उपवन बनों..
मेरा हिरनी सा इठलाना ...रामेश्वरी
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