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Saturday, February 11, 2012

छुप छुप कर धर्मपत्नी से गए घुमने लोदी बाग़...
मुस्कुरा रहे थे सोच आज तो बस खुल गए भाग ..
रंगीला मौसम था,  साथी साथ हसीं था ..
सोचा आज हम वलेंताईन फेस्टिवल मनाएंगे, 
ख़ुशी कम से कम आज तो जी भर मनाएंगे..
आज तो कम से कम उस डायन से पीछा छूटा है..
हमारी ही किस्मत में आज ये चाँद धरती पर टुटा है ...
बैठे  थे हम संग प्रेमिका डाल हाथ में हाथ ...
देख उनको प्रेम बतियाँ बतिया रहे थे  साथ ..
सामने से इक पडोसी टहलकर्मी करते आ रहे थे ..
उस वक़्त क्या कहिये नशा था प्रेमिका का आँखों पर ..
उस वक़्त हम शायद सावन के अंधे थे..
सर उनका स्नेह से हमारे कंधे पर थे ..
देखा श्रीमान ने जैसे ही हमें वहां...
सर्वनाश हो इन निगोड़े मोबाईल्स का...
उन्होंने आव देखा ना ताव ..
दौड़े वो जैसे रख सर पर पाँव ...
हटा दी उन्होंने आनंदित छावं ..
धर्मपत्नी को हमारी संग अपने ले आये..
अरमानो पर जैसे हमारी वो पानी फेर आये ...
धर्मपत्नी भी  काली रूप में सवार आई थी....
क्या कहूं कैसे नैया हमने भी पार पाई थी ...
दोनों में हुई फिर जमके हाथा पाई थी...
 क्या कहें दोस्तों, हम वलेंताईन मनाने गए थे ...
पर माना कर, पिट कर, बेलन ताईन सर पर सजाकर आये थे...........आहाहहहाहः (रामेश्वरी)





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