कोई पूछे ना कि, मैं क्या रोती नहीं?
क्या देख कठोर दुनिया, मैं भावुक होती नहीं...?
थी मुझमें भी संवेदनाएं, रोती थी मेरी वेदनाएं ...
देख बहती धार लहू की, यूँ रोज चौराहों में..लगे जैसे संवेदना ही नहीं, वेदना भी मिट रही ..
तनिक पीड़ा नहीं, रक्त रंजित हाथ उनके ...
बिछा दी धरा पर पल भर में , इक युवक की रक्त रंजित लाश ..
क्यूँ इतना मानसिक रोगी इंसान हुआ, किसकी उसे तलाश ?...
क्या उसकी तलाश ख़तम होती लहू में नहा ?
क्यूँ इंसान में सहनशीलता लुप्त हो रही?...
इंसानियत इंसान में ही क्यूँ गुप्त हो रही ..?
क्यूँ उस पर झूठा अहंकार, दिखावे का श्रृंगार हावी है ..
दौड़ सा रहा अन्धकार की ओर, क्यूँ उस पर धन इतना प्रभावी है .......
(रामेश्वरी )

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