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Saturday, February 25, 2012

झडे थे जो पात शाखाओं से पतझड़ में.
नव कोपलें फूट रही हैं उन शाखाओं पर 
फिर बसंत छा रहा है, 
धूप की रंगत भी अब रौद्र रूप पीली है ..
धरा भी पीले फूलों से पीली२ हो रही है...
मदमस्त भंवरा भी गुन गुन मंडराने.. 
लगा है...
पीली सरसों बिखरी, जैसे वो बाहें फैला ..
आकर्षित करे प्रेमी युगलों को समाने खुद में ..
पलाश भी जैसे गोरी के गालों में रंगत दे ...
लाल होने लगा है, 
गांव गांव मेले लागे बसंत के....
जैसे वो भी अरसे से बिछड़ों को मिलाने में ..
लगा है......
प्रभाकर भी अब सूरज मुखियों को बहकाने सा..
लगा है..
खड़ी सारी खेत में...मुख उसी की और किये..
लाज तज निहारे बस सूरज को..देख उनकी हालत ..
जैसे खेत भी अब मुस्कुराने लगा है..............थैंक्स( रामेश्वरी )

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