भारत माता के माथे की बिंदी है हिंदी...
सिन्धु से हिन्दू, हिन्दू से हिंदी रची ..
हमारी सभ्यता की नींव है ये हिंदी..
हिंदुस्तान का ह्रदय है ये हिंदी .
आज ये अपने ही देश में रो रही..
अपना ये अस्तित्व पहचान सी खो रही...
हिंदी से हिन्दुस्तान मानचित्र पर खड़ा...
हिंदुस्तान की रग, इक डोर में बांधे जो..
वो मजबूर डोर है हिंदी, हिंदी सबकी आन
खड़ी, ब्रज, अवधी, मैथिली, बुन्देलखंडी ..
सब संतान है जिसकी, वो मातृभाषा है हिंदी ...
उर्दू , फारसी, संस्कृत, को, दी अपनी छाया..
मोल इसका आज कोई ना समझ पाया ..
देव लोक से देव नागरी लिपि यह है कहलाती....
शर्म आती मुझको जब अपने घर अंग्रेजी पूजी जाती ..(रामेश्वरी )
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