मैं क्या जानूं, कब आया बसंत ऋतुराज है...
खिले होंगे टेसू, गेंदा, पलाश, बुरांश सभी...
मोऊ पे फर्क हो कैसे, मेरे सजन जब पार हैं...
मेरे लिए बिन साजन, बसंत भी पतझड़ समान है ..
आयें जब सजन सूने से इस आँगन मेरे,
तब सग्र पतझड़ में भी जैसे खिली बसंत बहार है..........रामेश्वरी
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