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Monday, February 20, 2012

अगन

हर पल धधकता चेहरा तेरा ...
हर वक़्त क्रोध हावी..
लगा, जब जब देखूं छवि तुम्हारी ..
क्यूँ रहते उग्र इतने..
वज़ह क्या, तपन की तुम्हारी ...
छली किसने प्रीत तुम्हारी .., 
हृदयाघात हुआ था ...
क्या तुम्हें भी...
प्रेम किया था क्या किसी से..
कौन थी वो प्रेमिका तुम्हारी..
सैंकड़ो बरस बीत गए...
क्रोध ज्वाला शांत ना हुई तुम्हारी ...
क्रोध की अगन तेज 
इतनी ..

प्रेम में शीतलता, कितनी रही होगी तुम्हारी (रामेश्वरी)

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