उड़ चल, मन पखेरू, चल उड़ा चल, चल वहां ...
आशाओं के बीज फेंके थे जहाँ पिछली बार,चल...
शायद अंकुरित हुई हो अमर बेल वहां आशाओं की ..
उड़ चल, मन विहंग, अपनी इस भारत माँ के कोने२ को...
दाना चुग चैन ओ अमन का, हर आँगन फ़ेंक आती मैं...
देखना चाहती मैं, सम्पूरण दुनिया, धरती और आकाश...
महसूस करना चाहती, हर चिड़िया के घौसले का आभाश..
समझना चाहती मैं, चहचहाती पंछियों का शोर...
देखना चाहती मैं, कहाँ है वो, जो बांधे हैं प्रकृति की डोर...
संग संग नाचना चाहूं, सावन मैं संग मोर,
वो पंख फैलाए, मैं अपनी बिखरी लटें फैलाये ...
ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा हे ईश्वर...शायद तू समझ जाए ...............रामेश्वरी

No comments:
Post a Comment