मिटा मिटा कर भी मिटती नहीं कैसी उनकी ये भूख, जो ओड़े खादी भेष |
देश सारे खा गए, भरे गए उनके ब्रह्माण्ड से पेट, बचे तो सिर्फ कागजी द्वेष ...
कागजी द्वेष भी भूख मिटा रहे काले कोट धारी की, वाह न्याय प्रिये प्रदेश |
जो बचे वो खा जाती महंगाई है, पेट भरने मजबूर पिता त्यागे अपना स्वदेश |||...........रामेश्वरी
देश सारे खा गए, भरे गए उनके ब्रह्माण्ड से पेट, बचे तो सिर्फ कागजी द्वेष ...
कागजी द्वेष भी भूख मिटा रहे काले कोट धारी की, वाह न्याय प्रिये प्रदेश |
जो बचे वो खा जाती महंगाई है, पेट भरने मजबूर पिता त्यागे अपना स्वदेश |||...........रामेश्वरी
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