जिन शब्दों से थी चिढ़ सी ..
चिढ़ वही, माँ की प्रेम चाशनी में डूब ..
दवा बन गयी...
रहा गुण पर हावी सदैव, रंगत सांवरी....
हैं आज भी घाव हरे, उन कटाक्ष के .
इन हृदय की दीवारों पर ...
जो मारा करती थी पड़ोसी मौसियाँ ..
पर इसी हृदय पर मरहम भी लगाता..
वही शब्द, माँ का पुकारना," प्रेम चाशनी..
से ओतप्रोत ..
"मयार कल्या "......
"मयार कल्या "......
(रामेश्वरी)

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