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Monday, February 27, 2012

वो पगला..

वो बैठ छत की मुंडेर ..
ताकना दुनिया को कितनी देर...
वो किसी की तकरार सारे राह में..
कोई जा रहे डाले, बांह बांह में ...
वो ताकना उस पगले को...
रोज करता जो जमा कूड़े का ढेर ...
साफ़ दिखती फिर वही जगह..
होती जब सुबह सबेर ....
जाने क्या था ये उस पगले का खेल ...
बच्चों संग बतियाता था वो..
संग खेलता था कभी क्रिकेट का खेल...
थी खटारा खड़ी कार ही उसका घर .
उसी में देर रात छुपाता था वो सर ..
कहते थे सभी पुलिस का जासूस होगा वो..
इक सुबह खबर फैली मोहल्ले में देर सबेर ..
निष्प्राण पड़ा था वो पगला...
बस स्टैंड पर ठण्ड से अकड़ा ..
(इक पगला जिसे मैंने बचपन में देखा था.....रामेश्वरी)
.

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