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Saturday, February 25, 2012

कमल चक्षु तेरे, नीर गंगा जल ...
मोतियों सी मुस्कान ...प्रिये |
तन मन तेरा, पवित्र धाम प्रिये ..
मैं साधक, तू ही मेरा भगवान प्रिये ..||..(रामेश्वरी )



शाखाओं के पातों पर पड़ी ..
जो मोती सी चमकती ओंस की बूँदें हैं..
वो नीर है नैनो से गिरे, मेरे आज ...
छुपाया जग से,  नीर इन पातों पर क्यूंकि ..
मरुस्थल इस जग के जज्बात  हैं ....
(रामेश्वरी)




मेरे सागर समान, प्रेमी ह्रदय पर..
ये दो छींटे प्रेम, मार गया कौन .......

मैं ताकती रही आसमां,  बन प्यासा पपीहा ..
मेरे सूखे अधरों पर, सावन बरसा गया कौन ...........रामेश्वरी 

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