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Monday, February 13, 2012

जो कभी आशिकों का सरदार था..
आज रोड पर रिक्शा चला रहा है....
नयी जींस की पेंट पहनके....
पहला दिन पहला शो देखा करता था...
आज फटी लूंगी मे, आशिकों को बैठा रिक्शे में..
सिनेमा घर का रास्ता दिखा रहा है.....
कभी पान चबा कर, सेंट लगा कर,
घूमता था मोहल्ले की बुलबुल के पीछे...
आज देखो उन्ही को बहिन जी"कहाँ चलोगे"
कह कर लगातार आवाजें लगा रहा है......
कहता था रोज उस बुलबुल से बड़े गर्व से..
तेरे लिए जानू" चाँद तारे भी धरती पर तोड़ कर लाऊंगा"
आज खुदा देखो उसी को चाँद तारे दिखा रहा है....
घुमा करता था वलेंताईन डे पर लेकर लाल गुलाब का फूल ...
देखो ज़रा..आज खुद कुकुरमुत्ते सा मुरझा रहा है....

(रामेश्वरी) ........

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