पत्थर2 कह दुत्कारा सबने मुझे..
ठोकर मार आगे बढ़ गए,
क्या कभी मोम का बुत सह सका, तपिश तेरी..
मैं वो, जिस बुत को तू धूप दे या छावं दे मर्जी तेरी ...........
मोम पिघली तो बेदर्दी कहलाई तेरी...
मैं उफ़ भी करूं तो खुदगर्जी मेरी..............रामेश्वरी
क्यूँ खुशफहमी पालते हो...
पत्थर दिल सनम में दिल तलाशते हो........रामेश्वरी
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