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Saturday, February 11, 2012

*******ढूंढती हूँ**************

इन शहरी कंक्रीट के वनों में...
अपना वजूद ढूंढती हूँ..
कितनी भीड़-भाड़ है, शोर है यहाँ ..
भीड़ के शोर में खोयी अपनी ...
आवाज़ कब से ढूंढती हूँ..
आई थी गांव की खुली हवा से...
चहचहाते हुए इस वन में..
जैसे कोई उन्मुक्त पंची उड़े....
पंख खोल नील-गगन में...
इस वन में अपने पंख ढूंढती हूँ...
हर कोना इस वन का भरा हैवानो से..
खरीदना चाहे सब, चंद सोने के दानो से ...
हर कोने में वन के, खोया इंसान ढूंढती हूँ..
अस्तित्व बनाने आई, इस कंक्रीट वन में...
कहीं खो सा गया, गुमशुम सा हो गया ...
वो अपना मुस्कुराता अस्तित्व खोजती हूँ.............

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