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Sunday, August 18, 2013


कैसी आबो हवा है आजकल। 
हर शख्श झूठी मुस्कान लिए नज़र आता है। 

बादल भी अब रुठते नहीं। 
हर रोज भीगा मंज़र नज़र आता है। 

दरो  दीवारों में ख़ामोशी पसरी।
हर रिश्ता रेत सा नज़र आता है। 

पहले इंतज़ार था उसका,  खिड़की तले। 
अब वहां सिसकता  लहू नज़र आता है। . 

कण कण संगीत था , प्रकृति जहाँ। 
वहां शमशान का सन्नाटा नज़र आता है। 

ख़ुशी के आंसुओं में "रामी" वो नशा कहाँ। 
मेरी गली में हर शख्श गम पीता नज़र आता है। 

विशाल अनंत थी, सीमायें देश की मेरी। 
हर गली क़स्बा,  नया देश नज़र आता है। 

समय ठहर सा गया,  अपनों के लिए वक़्त नहीं। 
इंसा हर ओर  पंख लिए उड़ता नज़र आता है। 
(रामेश्वरी)

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