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Saturday, August 11, 2012

यूँ ही व्यर्थ बहे जा रहे थे आंसू..
समेटा, बना दिया बादल इन्हें..

बरसों से उझडा आशियाना...
सूखे हैं खेत खलियान ..
बरसूँ, वो हरा जो जाए..
गए मुसाफिर को मालूम हो जाए..
खड़ा है ये खंडहर ..
हरा होना चाहता है आज भी ये..
बस अपनों के इंतज़ार में...

चाहती हूँ..
अब गिरे जो, बरसे किसी प्यासे के हलक पर...
या गिरे किसी थके हारे किसान की पलक पर....
धनवानों का क्या है..
वो कब नमकीन पसीना बहाते हैं..
वो तो बारिश नोटों की कर ..
नोटों में नहाते हैं..रामेश्वरी

1 comment:

  1. वाह ...वो कब पसीना बहाते हैं ......बहुत सुंदर

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