सखी बसंत आयो है...
संग अपने फागुन लायो है..
अब टेसू पलाश भी खिले आंगन मेरे .
फिर से होगी होलिका दहन...
आँगन मेरे ..
होगी फिर से हुडदंग होली...
झूमती आएँगी मस्तो की टोली ....
श्याम स्वेत वर्ण सब समान..
संग जल के प्रेम फुहार होगी...
पिया संगे खेलूँ, फिर मैं होली..
भीगे२ तन मन में भी देख सखी..
उमड़ रही गरम साँसे होंगी....
उस दिन प्रेम पर ना बंधन होगा ..
ना एह्साओं पर सीमायें होंगी..
गर वो कृष्ण मेरी नगरी के होंगे..
संग उनके पड़ोस की बालाएं होंगी ..
आँगन मेरा ज्यूँ ब्रज होगा ...रामेश्वरी

WAAH BAHUT SUNDAR
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