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Sunday, February 12, 2012

(रोटी).

(रोटी)..............pratiyogi rachna

रोटी तू क्यूँ गोल गोल है...
तेरे आगे फीके सबके बोल हैं...

इक तेरे लिए....
अभिशप्त !
वो अभागी !
निस्तेज , जर्जर काया, और ,
यूँ ही सर पर उठाए गारे का बोझ ...
उस पर मृतासन पड़े पति, भूखे बच्चों का बोझ .
लिए उस निर्माणाधीन ऊँचे भवन की सीढियां चढ़ती उतरती रहती !
घर पर बच्चों की भूख प्यास ,
उस लाश को भी मशीन बना देती है ,
वो मशीनी लाश मशीन भी चला लेती है...
हाय रे रोटी !

भूख के तिलिस्म में भटकती उसकी बैचैन आत्मा ,
बन जाती है ठेकेदार की हाजिरी ,
कंगाली, भुला देती है , थकान, धर्म और इबादत ,
पूंजीपति की बेरुखी में घूरती आँखों में ..
पलती है रोटी की अंतहीन तलाश , ..

अस्मत के भूखे, व्यभिचारी भेडिये
नोच खसोट सकें , इसलिए ..
उतार कर वो जिस्म से वो चिथड़े ..
हर रोज खड़ी हो नीलामी में किसी मयखाने में ...
ढांपे उन शरीर के अंगों को हरदिन ...
उन भेडियों के दिए महेंगे कफ़न से......
और इस तरह, बेगैरती के इन तराजुओं के
पलड़े में रखी लाचारी के सामने ,
धुंध सी शर्मो हया घुटने टेक कर , बन जाती कई मासूम छोटे -२ हाथों की
रोटी !
ख़ाक जन्नत का होता यकीन उसको,
हररोज जो नापाक अस्मत घर आके धोती....
तलाशती जो रही हर वक्त रोटी,
कांपते हाथों से बेल्ट बाँध ली उसने, कि चंद धमाकों की खातिर
तेरे बच्चों को मिलेगी अब पेट भर रोटी!

- रामेश्वरी नौटियाल बहुखंडी (20/१२/११)
मैंने यह पंक्तियाँ यह सोच कर लिखी हैं की अधिकतर सभी गुनाहों और पापो, अधर्म की बुनियाद ये रोटी है....यही इंसान में लालच बन बसती है ...यह रोटी की भूख ही है जो सबको बुरे कार्य करने पर मजबूर करती है...हर कोई अपने और अपने परिवार का ही पेट भरा रहे खुश रहे के लिए धर्म अधर्म का भेद भूल चुका है....जब सबका पेट इस धरा पर भरा होगा...शायद पाप अधर्म कम होगा......नमस्कार

4 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना रामेश्वरी जी और सच भी है ये रोटी या कहिये की पेट की भूख बहुत कुछ करवा देती है ............आपको बहुत -बहुत बधाई

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  2. कांपते हाथों से बेल्ट बाँध ली उसने, कि चंद धमाकों की खातिर
    तेरे बच्चों को मिलेगी अब पेट भर रोटी!
    vaah !

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  3. dhanaywad aur namaskar chamoli ji.....aap bhi hamare liye ek prerna hain

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