Search My Blog

Monday, February 6, 2012

बैठ तले नीड़, भुला गर्भ पीर ..
जर्जर काया, जर जर चीर..
गोद बालकन का पेट भरना ..
गर्भ को लहू से करे वो सींच ..
इक प्याज दो रोटी की चाह .
बैठाती कभी वैश्यालय की राह...
घिरी कभी तो मदिरालय में दिन रैन ..
तन उसका झांकते हवस भर नैन ..
रख कंकड़ पाथर टोकरा नंगे सर...
राह बनाये दौड़ने, ऊँचे सेठों की कार ....
चलती पैदल राहों पे, अभाग्य स्वीकार ...
खानाबदोश ज़िन्दगी, मेहनत बंदगी,
धर्म से परे वो, शिक्षा से अनजान ...
सीमा पार तब होती है सरे चौराहा ..
जन्म देती इक नया जीवंत शरीर...
देख लगी भीड़ वहशियों की भूल उसकी पीर ...
कहकहा लगा रहे, शर्म करो डालो उस पर चीर ..............रामेश्वरी

No comments:

Post a Comment