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Wednesday, January 18, 2012

कल कल बहते झरने की..
कू कू करना मैयने की...
वो हल्कापन लिए ठंडी शीतल हवा..
वो कन्द मूल का साग...
वो कोयल का मधुर राग..
ढके जैसे कपास से ईश्वर ने .
वो सफ़ेद ऊँचे परबत पहाड़ . ..
देख देख प्रकृति के भिन्न2रूप..
मन हुआ क्यूँ यूँ बाग़ बाग़...
नित नए पुष्प दिखे ...
जाऊं जब भी प्रकृति के द्वार..
जुदाई सहन करू कैसे..
इन नाज़ुक कोमल फूल पौधों से...
रम्हाते अपने भोले से ..
नीले२ अम्बर पर बिखरे लाखो ..
टिम-टिमाते..तारों से..
बरसों हो जाते हैं देखे ऐसा आकाश पटल
हवा की सर्रर्र, दरियाओं का स्वर कल कल...
चलती जाती जैसे2 गाडी..
आये संग संग जैसे इक पुकार ..
जल्द आना लौट कर मेरे बच्चों..
अपनी इस माँ के आँचल में..
खुला है मेरा ह्रदय द्वार...
(रामेश्वरी)

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