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Sunday, April 1, 2012

बचपन

इस दुनिया में नफरत का डेरा है..
सब करते बस हमेशा तेरा मेरा हैं..
चल उस जहाँ की और जाते हैं...
जहाँ से बचपन फिर ख़रीदे जाते हैं ...
जब जब बचपन हमारे साथ था ..
कहाँ दिन-रात का फर्क,ख्याल था ...
सब आँगन अपने हुआ करते थे..
सुबह आँगन अपने, दुसरे पल 
दुसरे आंगन झुला झुला करते थे..
पड़ोस की आंटियां भी माँ सा आदर ..
हम बच्चों से पाती थीं...
इक आज्ञा उनकी सर आँखों रखी जाती थी ...
दोस्ती ही हमारी उस पल रब्ब हुआ करती थी..
माने तो अब्बा ना माने तो बस कुट्टी हुआ करती थी...
आज कंक्रीट जंगल इतना विशाल हुआ है..
बचपन खुली हवा को तड़पकर बेहाल हुआ है...
इंसानी जानवरों के बीच इस जंगल में बचपन...
उम्र से पहले बुजुर्गी का एहसास भरे ढला हुआ है

2 comments:

  1. इंसानी जानवरों के बीच इस जंगल में बचपन...
    उम्र से पहले बुजुर्गी का एहसास भरे ढला हुआ है.......bahut badhiya

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