बनना नहीं मुझे रेत..
जिसका मिजाज़ बदलता रहता है..
दिन में गरम रात में ठंडक देता है...
निशान तक तो जो पग के सहेज सकता नहीं...
दरिया आये गर समाने ..
खुद को वो रोक सकता नहीं...
धीर खो बह जाता है संग दरिया...
बनाना ईश्वर मृत्तिका मुझे..
समाती भीतर अपने अनगिनत बीजों को...
जन्म देती फिर उन्हें पौध रूप ..
जलजले आये ..आये सो तूफ़ान ..
धरा वहीँ रहती है...
कई दिनों तक पद चिन्हों को सीने पर सहती है..
धैर्य वो खोती नहीं...
फट कर, सीता को भी समाती खुद में..
बहा लावा कलेजे से ..
निर्मित करे नव द्वीप ...
लज्जा सहेज कर रखती, है तो इक स्त्री...
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banana nahi mujhe ret.....
ReplyDeleteBahut sunder. Badhai