Search My Blog

Sunday, June 10, 2012

है मुझे भी इश्क ...


कौन कहता है हम इश्क नहीं जानते..
हाँ मुझे भी इश्क है, पर ज़िन्दगी से...
इश्क है चेहरों पर मुस्कुराते होठों से...
घिन है बेपेंदे के लोटों से...
इश्क है खिलखिलाते बचपन से...
रक्त में स्पंदित लड़कपन से..
संघर्ष करती उम्र पचपन से...
घिन है दोहरेपन से...
है  मुझे भी इश्क ...
भीड़ में अनजान चलते चेहरों से ...
घिन बच्चियों पर लगे पहरों से..
प्रकृति के बदलते पहरों से..
मत मिटती हूँ मैं भी..
हर उस पल..
जब भीड़ में गैर,  गैर को अपनेपन से हाथ बढाता है..
रोम रोम मेरा प्रेम से भर सा जाता है....
इश्क है बहती हवाओं से ..
पवन संग नृत्य करती शाखाओं से..
बहते झरनों से...
पहाड़ों में गूंजते अनजाने से संगीत से..
प्रकृति को भी मनमीत बनाओ...
बस इश्क को जिस्मानी न बनाओ...
कभी किसी गैर की और हाथ तो बढाओ ...
इश्क स्त्री पुरुष पर निर्भर नहीं..
जन्नत से नसीब है..
इससे सुफिआना बनाओ..
इश्वर की इबादत सा बनाओ..
जिस दिन बना पाओगे..
हर ज़र्रे में इश्क पाओगे......रामेश्वरी 





2 comments:

  1. इश्क है हमको हर जर्रे से ...इश्क ही मेरा जनून है
    बेहद खूबसूरत रचना ....

    ReplyDelete
  2. ji anu ji...log sirf jismaani yaa roop rang ka ishq dekhetey hain..jabki ishq kan kan main chhipa hai prakriti ke....dhanaywad

    ReplyDelete