गांव के गदनो में प्रेम की मिठास थी.
सर.र्र्र्रर्र्र्र बहती हवा में चीड की सुगंध थी.
झाड़ियों में कंदेली की सिरहन थी.
नन्हे बच्चों की आँखों में पिता के आने की आस थी.
मरती माँ की जैसे बेटे से मिलने को अटकी सांस थी.
सुख रहे हैं खेत सभी के, बंझर खेती पहले कहाँ थी.
बोली में मिठास सभी के ऐसी कडवाहट पहले कहाँ थी
उजड़े गए हैं पारंपरिक घर हमारे ईटों की दिवार है...
मसक बाज का संगीत कहाँ है हुआ दीजे का वार है..
गांव से निकलते ही पीछे इक सिसकती माँ की आवाज़ है.
बच्चों का रोना .पत्नी की दबी विरह वेदना की आवाज़ है
माँ पत्नी बच्चों का इक ही सवाल है..
फिर कब आओगे, फिर कब आओगे .
यही उनकी सिस्काती रोती पुकार
Bahut sudnar kavita. Suvkamnayain apko.
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