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Tuesday, March 5, 2013





इस छोर से उस छोर । 
आसमां को मिलाता है कौन ? 
काली घनेरी बदलियों को चीर । 
दूर क्षितिज तक । 
ये सतरंगी रंग बिखेरता है कौन ?

नयन विराम से हो जाते । 
जब जब इन्द्रधनुष आकाश पर पाते । 
सुना था, इंद्र धरा पर सौन्दर्य बाण चलाते। 
देख ये सतरंगी डोर ।  सोचूं ..
मनचली प्रकृति पर लगाम लगाता है कौन ?


सतरंगी रंगों से कुछ रंग उधार लिए । 
यूँ बेरंग जीवन को रंग हमने दिए ..
जीने की अभिलाषा का पथ ..
संग हाथ अपने  हाथों में लिए ..
हमें विकास की राह ..
दिखाता है कौन ?

इन्द्रधनुष से हमें रंग छोड़ना है ..
हर धर्म के लोगों को प्रेम से जोड़ना है ..
सभी धर्म सात रंग बन जाएँ । 
धरा के एक सिरे से दुसरे सिरे तक ..
नफरत भरे दिलों को,  भाईचारे की और मोड़ना है ...
(रामेश्वरी)

"तस्वीर क्या बोले" समूह मे मेरे कुछ शब्द ......




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