इस छोर से उस छोर ।
आसमां को मिलाता है कौन ?
काली घनेरी बदलियों को चीर ।
दूर क्षितिज तक ।
ये सतरंगी रंग बिखेरता है कौन ?
नयन विराम से हो जाते ।
जब जब इन्द्रधनुष आकाश पर पाते ।
सुना था, इंद्र धरा पर सौन्दर्य बाण चलाते।
देख ये सतरंगी डोर । सोचूं ..
मनचली प्रकृति पर लगाम लगाता है कौन ?
सतरंगी रंगों से कुछ रंग उधार लिए ।
यूँ बेरंग जीवन को रंग हमने दिए ..
जीने की अभिलाषा का पथ ..
संग हाथ अपने हाथों में लिए ..
हमें विकास की राह ..
दिखाता है कौन ?
इन्द्रधनुष से हमें रंग छोड़ना है ..
हर धर्म के लोगों को प्रेम से जोड़ना है ..
सभी धर्म सात रंग बन जाएँ ।
धरा के एक सिरे से दुसरे सिरे तक ..
नफरत भरे दिलों को, भाईचारे की और मोड़ना है ...
(रामेश्वरी)
"तस्वीर क्या बोले" समूह मे मेरे कुछ शब्द ......

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