तराश न मुझे इन निष्ठुर पत्थरों में...
रोना भी चाहें गर हम, फिसल जाए दामन से इसके....
ना दे आकृति बेजान सुखी रेत पर..
लिपट कर दामन, रहना जो चाहा भी हमने..
ये हवा के झोंकों से हमें छुड़ा न सके....
खुद में बसा हमें बस अपना खुदा बना ले....
दे दे पर दो हमें, सबसे हमें जुदा बना ले...
.रामेश्वरी
वाह
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