काश नारी जीवन, मैं नारी ना होती ..
पग पग क़दमों तले मेरे आरी न होती ..
घायल हुआ जीवन मेरा..
होती उड़ान मन चाही मेरी,
मन में दबी चिंगारी न होती..
बन चुकी है वो आग अब..
सुलगाई रसोई सदा जब..
अब इस अग्नि से खुद को तराश ..
स्वर्ण आभा दूं..
क्यूँ चढ़ूँ सदैव मैं ही..
देवता के शीश..
देवदासी बन..
इश्वर दरस कभी पाया नहीं..
आड़ इश्वर की ले..
सदैव पुरुष नज़र आया हर कहीं...
कभी बना सामान, मन सम्मान का मुझे..
वेश्यालयों में सजाया कभी..
कीचड है दलदल है वहां..
कमल है जीवन मेरा..
उदर संतान का भर पाया तभी..
ना डरी न डरूँगी कभी
बना इसी अग्नि को इंधन ..
अपनी उड़ान खुद भरूँगी...रामेश्वरी
बहुत सुंदर ....प्रेरणादायक ...रामी सखी
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