क्यूँ गुमसुम रहूँ मैं, ज़रा खुद में उमंगों की स्याही भर लूं मैं।।
ज़ज्बात क्यूँ दफ़न करूँ, मुझसे ही बीता इतिहास बोलता है ।।
ज़ज्बात दबे हैं सीने में, उफनते हैं जब कोई पन्ना खोलता है ।।
खौफ जिन्हें मेरी रोशनाई से, वो मुझे रहने को खामोश बोलता है ।। रामेश्वरी
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