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Sunday, January 13, 2013

मैं कुर्सी ..

मैं कुर्सी ..
कहने को है पाँव चार ।
बैठी देखो कैसी लाचार ।
जो आया ..
आसीन हुआ ..
जुबान पे ताला ..
कसा हुआ ..

ईमान को गोद दे न पाऊँ ।
बेईमान डट कर जमा हुआ ।
जी आया कभी-कभी ।
तोड़ दूं पैर खुदी के मैं ..
मैं आसीन वहीँ की वहीँ ।
लगा बोली मेरी ।
बेईमान सारा जहां घुमा हुआ ।

मैंने ही रची ..
रामायण, महाभारत यहाँ ।
मैं ही गुमनाम रही ।
सोचो।।
क्या मैं ही भगवान् नहीं ? 

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