कौन थी या कौन हूँ मैं ..
नीर बन अपने ही अश्रुओं मैं बह गयी ..
पीर बन क्यूँ भावनाओं मैं तैर रही ..
इक पंछी थी , इक डाली थी ..
क्यूँ खुद को त्रिशंकु बना लिया
आशा का दीप खुद मैं जला लिया
इत् जाऊं उत जाऊं क्यूँ
?चिनह लगा लिया ..
हवा को क़ैद करता है कौन ..
मैंने खुद को हवा बना लिया ..
महकती हवा बन जग मह्काऊंगी .
इश्वर के दर कभी ..कभी घर घर जाऊंगी ..
कभी छूकर पुष्प को , कभी मदिरालय जाऊंगी ..(रामेश्वरी )
हवा मैं मद भर लाऊंगी ....
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